Saddle peak trek , andaman nicobar islands

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टिकट बुक कराने के बाद हमने फिर से​ डिगलीपुर के मेन चौक पर जाकर बस पकडी । बस में इस बार हमने आखिरी गंतव्य तक का टिकट लिया जो कि सैडल पीक का ...



टिकट बुक कराने के बाद हमने फिर से​ डिगलीपुर के मेन चौक पर जाकर बस पकडी । बस में इस बार हमने आखिरी गंतव्य तक का टिकट लिया जो कि सैडल पीक का बेस है । होटल तक का किराया 14 रूपये तो यहां तक का किराया 17 रूपये लगता है । टिकट बुक कराने के बाद एक तरफ मानसिक शांति थी तो दूसरी ओर आज ही आज में सैडल पीक की चढाई करनी थी क्योंकि कल सुबह हमें वापस पोर्ट ब्लेयर के लिये जाना था ।


सैडल पीक के बेस पर सडक खत्म हो जाती है और जंगल शुरू हो जाता है । यहीं पर एक आफिस बना हुआ है जहां से सैडल पीक के लिये परमिट बनता है । यहां पर एक कार खडी थी जिससे ये पता चलता था कि कुछ लोग और भी हैं जो वहां पर गये हैं । हमने आफिस में आवाज दी तो एक बंदा आया जिसने हमारा परमिट बना दिया ।


सैडल पीक नेशनल पार्क है और यहां पर एक आदमी के प्रवेश का शुल् 25 रूपये भारतीय के लिये है । कैमरे के लिये 10 रूपये है । हम तीन आदमी और दो कैमरे थे इसलिये 95 रूपये देकर अंदर की ओर बढ चले । राजेश सहरावत जी का इरादा उपर चढाई करने का नही था । पीक तक का रास्ता 8 किलोमीटर का था । अभी सुबह के 11 बजे थे और इस घने जंगल में ना तो कोई बना हुआ रास्ता था और ना ही कोई सुविधा । लाइट पानी और सुरक्षा का कोई इंतजाम भी नही था इसलिये हमें हर हाल में दिन ढलने से पहले ये 16 किलोमीटर का रास्ता तय करना था । 


सैडल चोटी की ऊंचाई--सैडल पर्वत-saddle choti ki unchai kitni hai--सैडल पीक अंडमान की सबसे उंची चोटी है जो कि 730 मीटर के करीब उंची है । इस आठ किलोमीटर के रास्ते में 3 किलोमीटर का रास्ता प्लेन है और सारी चढाई केवल 5 किलोमीटर में है । ये चढाई बहुत ही खडी है जिसे आप आगे चलकर देखोगे । फिलहाल हम बढ चले और ​रंग बिरंगी तितलियां हमारा स्वागत करने लगी ।


कुछ दूर करीब आधा किलोमीटर चलने के बाद राजेश जी वापस चले गये । हम भी इस बात को जान रहे थे कि अगर आज हमें टिकट बुक कराने के लिये नही जाना होता तो हम सुबह 5 बजेे के करीब यहां के लिये चलते और तब हम राजेश जी को अपने साथ ले जा सकते थे । वे कितना भी आराम से चलते तो भी हम 12 घंटे में वापस आ जाते । अब मै और जाट देवता दोनो ही आराम से चलने लगे । पहले तीन किलोमीटर का रास्ता अजीब सा है । यहां पर जंगल में पेडो पर लाल और पीले निशान लगे हैं रास्ता बताने के लिये । कई जगह तो जहां पर ये निशान लगे हैं वहां पर रास्ता बारिश के पानी के आने की वजह से बंद हो गया है ।


यहां पर पेड गिरने और कई वजहा से कई बार हमें रास्ता नही मिला तो कई बार पेडो के उपर को कूदकर और कई बार झाडियो से निकलना पडा । एक किलोमीटर के बाद एक नाला आया जिसे पार करने के बाद हम पगडंडी पर चलते रहे और दो चार घर जहां बने थे वहां पर पहुच गये । वहां पर एक औरत बैठी थी जिससे हमने पूछा तो उसने बताया कि तुम गलत आ गये हो । हमें समंदर के किनारे का ध्यान रखना था । समंदर दिखता रहे वहां तक ही रास्ता है । आप बीच के किनारे किनारे पर भी चल सकते हो पर बीच पर हर जगह रेत ही नही है वहां पर कई जगह दलदल और बडे बडे पत्थर भी हैं इसलिये चलना तो जंगल के रास्ते ही चाहिये । 


घना जंगल और विचित्र तरह के पेड , उपर से ये बरसाती जंगल बडे बडे पेडो से लेकर लम्बी लम्बी बेल समेटे हुए था । अब के बाद हमने पक्का मन बना लिया था कि समंदर थोडी दूर से दिखता रहे बस उसी रास्ते को चलता रहना है । बीच में पानी की कई धाराऐं आती हैं । तीन किलोमीटर बाद समंदर एक ओर को रह जाता है और चढाई शुरू हो जाती है । यहां पर वन विभाग वालो ने एक झौंपडी बना रखी है । 


यहां पर रास्ते में घंघा खूब मिलते थे जो जरा सी आहट लगते ही अपने खोल में बंद हो जाते थे फिर चाहे आप उनके उपर पैर भी रख दो तो कोई बात नही । इस झौंपडी को पार करने से पहले जो नाला आया था वो समंदर में जहां पर मिल रहा था उस पर एक पेड पडा था इसे पार करने के लिये । वैसे समंदर के किनारे भी पानी का बहाव ज्यादा नही था इसलिये इसे पेड के उपर से पार करने की बजाय हमने पानी से पार किया । शाम को आते समय इस जगह को हम उसी जगह से पार नही कर पाये क्योंकि उस समय हाई टाइड हो चुका था और यहां पर पानी काफी बढ गया था

diglipur
saddle peak base
saddle peak base
saddle peak office
saddle peak office
saddle peak trekking , andaman
saddle peak trekking , andaman
saddle peak trekking , andaman
saddle peak trekking , andaman
saddle peak trekking , andaman
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समंदर इतनी दूर से दिखता रहे
butterfly
खूबसूरती यहां पर बिखरी पडी है
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जाये तो जायें कहां
saddle peak trekking ,andaman
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यही है वो पानी की धारा
saddle peak trekking ,andaman
saddle peak trekking

सैडल पीक अंडमान की सबसे उंची चोटी है । यहां तक जाने के लिये समंदर के किनारे किनारे

जंगल में पगडंडी है जिसमें जगह जगह पेडो पर निशान बनाये गये हैं लेकिन इसके बावजूद रास्ता बदलता रहता है क्योंकि बरसात में अलग अलग जगहो से पानी आने की वजह से और पेड गिरने की वजह से भी रास्ता कई जगह से बंद हो जाता है और नयी जगह अपने आप ही नया रास्ता ढूंढना पडता है ।


पहली बार ऐसी यात्रा कर रहे थे जिसमें रास्ते के नाम पर भयंकर जंगल में एक पगडंडी थी बस । 3 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद चढाई शुरू हुई और चढाई क्या थी बस शुरू से लेकर आ​खिर 5 किलोमीटर तक बस चढना ही चढना था । शुरू शुरू में तो ठीक ठाक रास्ता था पर उसके बाद तो मामला खतरनाक भी था क्योंकि एक तो पूरा रास्ता कच्चा था और बारिश के मौसम और पिछले दिनो बारिश होने की वजह से गीला हो चुका था । घना जंगल होने की वजह से पत्ते भी पूरे रास्ते पर बिखरे पडे थे जिनके उपर पैर रखने पर नीचे मिटटी के गीले पन का पता नही चलता था ।


कई बार ऐसा हुआ कि फिसलते फिसलते बचे । उसके बाद चढाई में कुछ मोड आये जहां पर स्थानीय प्रशासन ने बांस को पेडो से ठोककर रेलिंग टाइप बना दी थी ​ताकि कोई नीचे खाई में ना गिर जाये । इन रेलिंग में भी ऐसे रास्ते थे जहां पर पेड गिरे पडे थे और उन्हे पार करके ही जाना था और कोई रास्ता भी नही था । ऐसी जगह पर प्रशासन ने एक काम तो अच्छा करा रखा था कि लकडी के छोटे छोटे लठठे सीढी की जगह नीचे जमीन में ठोक रखे थे इससे फिसलन कम हो गयी थी ।


पूरे रास्ते में घेंघें और किरलिया यानि की केजरीवाल उर्फ गिरगिटो की मौज है । ये पूरा जंगल तो जैसे उनका और उनके खानदान का है । इस घने और शांत जंगल में अगर कोई आवाज होती है तो वो उन्ही की है । वे जब आपकी आहट पाकर पत्तो में सरसराते और भागते दौडते हैं तो आप समझते हैं कि कोई आ गया है । जाट देवता आगे आगे ही थे और मै अपनी चाल से चला जा रहा था । हम सोच रहे थे कि सुबह सवेरे के गये वे लोग जिनकी गाडी नीचे खडी है वो हमें वापिस आते हुए मिलेंगें । 


जंगल में काफी चीजे नयी देखने को मिली पर एक बात ये भी थी कि प्रकृति का ये अनछुआ रूप है । अंडमान आने वाले ज्यादातर लोग हैवलाक और पेार्ट ब्लेयर तक ही सीमित रह जाते हैं । ज्यादा हुआ तो बारातांग तक उनकी दौड हो जाती है । इस प्रकृति के अजूबे को देखने के लिये प्रकृति प्रेमी ही आ पाते हैं । 


सैडल पीक से थोडा पहले ही लगभग एक किलोमीटर पहले हमें चार लडके मिले । वे उसी गाडी में आये थे जो हमें नीचे मिली थी । उन्होने बताया कि वे सुबह सवेरे चले थे और यहां पहुंचकर तीन घंटे तक उपर से मस्त नजारो को देखते रहे । वाह भाई अब हम देखने चले तो अचानक बारिश आ गयी



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sea shore
beautiful view of beach
tree at saddle peak
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tree at saddle peak
इसे शायद कोढ हुआ है
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ये जडे बहुत बढिया काम करती हैं
jaat devta sandeep panwar
jaat devta sandeep panwar
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saddle peak trek , andaman
saddle पीक से आधा किलोमीटर पहले ही तेज बारिश आ गयी । अगर घना जंगल ना होता तो पोंछू निकालने से पहले तो मै भीग चुका होता । इस बारिश में जाट देवता आगे निकल गये थे और मै अकेला था । पोंछू की वजह से बारिश से तो बचाव हो गया था पर अब गीली मिटटी होने की वजह से पेडो को पकडना पड रहा था पर पेडो पर अजीब तरह तरह के जीव होने से डर भी लग रहा था इसलिये दोनो तरफ से मुसीबत आ गयी थी । जैसे तैसे करके उपर चोटी तक पहुंचा तो जाट देवता इंतजार कर रहे थे । बीच में दो जगह व्यू प्वाइंट भी मिले लेकिन बारिश और कोहरे ने सब बेकार कर दिया था ।

इस कोहरे की वजह से जो व्यू दिखना चाहिये था यहां से वो भी दिखाई नही दिया । यहां पर एक मचान बना हुआ था और हवा बहुत तेज चल रही थी लगभग आंधी की शक्ल में चल रही थी । अपने हाथ में मैने पोंछू को उतारकर पकडा तो वो झंडे की तरह लहराने लगा । जाट देवता का अभी रूकने का मन था कि शायद मौसम साफ हो जाये लेकिन मुझे लग नही रहा था क्योंकि अब तो शाम का समय हो चुका था और हमें नीचे पहुंचना था वो भी उजाले में नही तो दिक्कत हो सकती थी । उतरने में तो अंधेरे में इस घने जंगल में वो भी गीली हो चुकी मिटटी में कैसे चल पायेंगें यही सोचकर परेशानी हो रही थी ।

चोटी पर कुछ फोटो खींच पाये क्योंकि बारिश की बूंदे हल्की हल्की बरस रही थी । हमने उतरना शुरू कर दिया । धीरे धीरे उतरने के बावजूद हम कई जगह फिसले । उसके बाद हमने दो लाठी जेसी लकडी ली तब जाकर कुछ राहत मिली । नजारे तो उपर ही मिलते जो कि मौसम खराब होने की वजह से मिले नही और जंगल के हम देख ही चुके थे इसलिये जैसे ही चढाई खत्म हुई तो तुरंत तेजी से चलना शुरू कर दिया । वापसी में हमने उस जगह को देखा तो चौंक गये जहां पर हमने पानी की धारा को समंदर में मिलने से पहले पार किया था । अब वहां पर हाई टाइड की वजह से पानी काफी बढ गया था । पानी से पार करना खतरनाक था और पेड से पार करने में संतुलन बिगडने का खतरा था इसलिये हम पानी की धारा के साथ साथ पीछे जंगल की ओर चले और वहां पर जहां पानी कम था और चौडाई भी वहां से हमने वहां से इसे पार किया ।

इस बार एक काम और किया कि हमने बीच के किनारे किनारे काफी दूर चलना शुरू किया । बीच के किनारे किनारे चलकर हम कालीपुर बीच तक जा सकते थे जो कि हमारे होटल के बहुत पास था और यहां से दिखाई भी दे रहा था । शाम होने तक हम आराम से बेस तक जा पहुंचे और यहां पर पूछा कि बस कब आयेगी । बस के आने में समय होेने तक वहीं पर एक गांव वाले की बनायी गयी चाय की दुकान पर चाय पीने बैठ गये । बस आयी तो उसमें बैठकर अपने होटल उतर गये ।

होटल में फिर से आज दाल रोटी का आर्डर दे दिया । कल वाला मैनेजर आज छुटटी पर था और उसकी जगह दूसरा बंदा आ गया था । खाना खाने के बाद हम कमरे में गये और राजेश जी द्धारा लाये गये काजू और बादाम का जाट देवता ने तीन हिस्सो में बंटवारा कर दिया । असल में काजू जहां भी रखे जाते उन पर तुरंत चींटी आ जाती । तीन हिस्से इसलिये किये थे कि सब पैसे दे देंगे पर राजेश जी ने बाद मे लिये नही । राजेश जी नमकीन के भी पैकेट लाये थे जो इस पूरे टूर में काफी काम आये ।

अगले दिन सुबह सवेरे हम लोकल बस मे बैठकर कालीपुर से डिगलीपुर जा पहुंचे । यहां पर हमारी बस खडी थी जो कि एसी थी । आज का पूरा दिन हमें सफर में ही बिताना था । बस में हमारी पिछली सीट मिली थी पर एक सवारी के नही आने से थोडी राहत भी थी । बस साढे सात बजे चली और रंगत तक पहुंचते पहुंचते काफी जोर से बारिश आ गयी जो पूरे दिन चलती रही । हम मानसून के मौसम में अंडमान में थे और बारिश ना पडे ऐसा कैसे हो सकता था लेकिन आज के दिन बारिश होने से हमें खुशी थी क्येांकि हम तो अपने टूर का नाश नही चाहते थे और आज हमारा टूर तो था नही इसलिये हम सोच रहे थे कि रामजी आज ही बरस जायें तो ठीक है । किस्मत से एसी बस मिली तो मौसम की भी कोई परेशानी नही थी । अंडमान ट्रंक रोड पर सफर करने का भी अपना ही मजा है

ANDAMAN -



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सुबह 7 बजे की बस थी तो हम डिगलीपुर आ गये । यहां से हमने कल एस एस ट्रांसपोर्ट की बस में बुकिंग करायी थी । जैसा कि मैने आपको बताया कि जब हमने बुकिंग करायी तो हम सरकारी बस में कराने के लिये ही परेशान थे लेकिन वहां का कोटा फुल हो जाने के कारण हमें प्राइवेट बस मिल पायी और वो भी लास्ट बस थी और उस बस की भी लास्ट सीट पर हमें तीन टिकट मिले । अगर हमने कल बुकिंग नही करायी होती तो आज किसी भी तरह यहां से निकलना मुश्किल था । 

एक ही तरीका हो सकता था कि लोकल बसो को बदलते बदलते रात होने तक पोर्ट ब्लेयर पहुंचते । खैर जो होता है अच्छे के लिये होता है । सीधे पोर्ट ब्लेयर की बस कम समय में पहुंचा देती है । सात बजे बस चली और दस बजे एक जगह नाश्ते के लिये रूकी । ये ऐसे ही दो तीन ढाबे थे जैसे हमारे यहां पर हाइवे पर होते हैं और ऐसे ही खाने के सामानो पर लूट थी । हमारे आश्चर्य के लिये हमारा एसी का टिकट सफल होने वाला था क्योंकि बारिश आठ बजे से शुरू हो गयी और शाम चार बजे ​तक चलती रही पूरे रास्ते । हम बरसात के सीजन में गये थे जब लोग अंडमान जाने से घबराते हैं और ये यहां पर आफ सीजन होता है पर कमाल ऐसा हुआ कि हमारे पूरे दस दिन में एक ​ही दिन बारिश पडी और वो भी उस दिन जिस दिन पूरा दिन हमने बस में बिताना था । बारिश की वजह से शीशे बंद करने पडे और बस में गर्मी नही लगी क्योंकि एसी था पर अगर सरकारी बस होती तो परेशानी हो जाती । 

दिन में एक बजे बस जेटटी से उतरकर खाने के लिये एक होटल के पास रूकी और कमाल देखिये उसी ट्रांसपोर्ट की वैसी ही बस जो कि पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर के लिये चली थी वो भी उसी समय पर पांच मिनट के अंतर से खाने के लिये उसी होटल पर रूकी । ये इन बसो की परफेक्ट टाइमिंग नही तो और क्या है कि ये जिस समय कहती हैं उसी समय पर पहुंचा देती हैं ।वैसे अंडमान में समय पर पहुंचाना इतना आसान भी नही है और जरावा क्षेत्र में कानवाई के समय के उपर भी कई बार निर्भर रहना पडता है । 

फिर से आज दो बार समुद्र पार किया बस में बैठकर । पहली बार यही सफर हमने दो से तीन दिन में किया था पर आज सारा एक ही दिन में करना था । आज कैमरे को बैग में बंद करके बस में पीछे की ओर रख दिया था तो चाह कर भी नही निकाल सका और निकाल कर करता भी क्या ऐसी बारिश में तो आज पूरा दिन मोबाईल से ही फोटो लिये । 

आज की शाम की हमारी बुकिंग डिगलीपुर के होटल की ही थी जोकि हम छोडकर आ गये थे और आज हमें अपने लिये कोई दूसरा होटल ढूंढना था । बस स्टैंड पर हम करीब 5 बजे आ गये थे और मेरा विचार यही था कि पहले दिन हम जिस होटल में रूके थे हम उसी में चलते हैं पर जाट देवता का मन था कि इतनी दूर क्यों जाना और आफ सीजन है तो यहीं पोर्ट ब्लेयर में ही कमरा ले लेते हैं । हमने पहले बस स्टैंड के आस पास कमरा ढूंढना शुरू किया और अचरज की बात थी कि यहां पर आफ सीजन के बाद भी कमरा खाली नही मिला । इसके बाद हमने आटो किया और अंडमान टील हाउस जो कि हमारे आखिरी दो दिन का मेजबान बनने वाला था वहां तक गये पर वहां भी ​कमरा खाली नही था । अब और ज्यादा ढूंढने से बढिया था कि हम आटो करके उसी होटल की तरफ चल पडे जो कि हमने पहले दिन लिया था । ये थोडा दूर था पर जाते ही कमरा मिल गया और इस बार साढे छ सौ की बजाय हमने सौ रूपये कम में ही तय कर लिया ये कहकर कि पहली बार बुक करने पर तो आनलाइन वालो को कमीशन भी दिया होगा पर इस बार तो वो भी नही देना है । आटो वाला जो हमें छोडने आया था उसी का नम्बर ले लिया और उसे बता दिया कि हमें कल हैवलाक जाने से पहले कुछ जगहो को घूमना है तो सुबह सवेरे फोन करने पर आ जाना 



ANDAMAN-


जाट का निरीक्षण
देानो बसे आमने सामने
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पोर्ट ब्लेयर शाम में
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