National highway andaman , Jarawa reserve forest trip

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आज 21 जून को सुबह 5 बजे उठकर तैयार हो गये । यहां पर सुबह के साढे चार बजे उजाला हो जाता है । सब काम भी शुरू हो जात...


port blair to baratang island


आज 21 जून को सुबह 5 बजे उठकर तैयार हो गये यहां पर सुबह के साढे चार बजे उजाला हो जाता है सब काम भी शुरू हो जाते हैं हम होटल से चैकआउट करके बाहर निकले और आटो पकडकर बस स्टैंड पर पहुंच गये हमारी बस 6 बजकर 45 मिनट पर थी और हिंदुस्तान की ट्रेन से भी ज्यादा पाबंद यहां की बसे और शिप या फेरियां अपने नियत समय से ही चलती हैं   

आज हमें रंगत जाना था और कल डिगलीपुर तक जाना था पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर की दूरी 325 किेलोमीटर की है रंगत बीच रास्ते में पडता है लगभग रंगत से पहले एक जगह पडती है बारातांग के नाम से आज पहले हमें वहीं तक पहुंचना था बारातांग में देखने लायक कई जगहे हैं एक तो यहां से स्पीड बोट के द्धारा लाइमस्टोन गुुफाओ तक जा सकते हैं यहीं से दूसरी ओर को पैरट द्धीप भी जा सकते हैं यहीं पर आठ किलोमीटर दूर मड वालकिनो यानि कीचड का ज्वालामुखी भी है तो बारातांग पोर्ट ब्लेयर से करीब सौ किलोमीटर दूर है जिसमें पोर्ट ब्लेयर से 50 किलोमीटर दूर जिरकातांग नाम का चेक पोस्ट आता है इस चैक पोस्ट तक कोई दिक्कत परेशानी नही है पर इस चैक पोस्ट के बाद 50 किलोमीटर यानि बारातांग तक सुरक्षित जंगल का क्षेत्र है जो कि जरावा आदिवासियो के लिये है जरावा नाम के ये आदिवासी अंडमान के वे मूल निवासी है जो कि आज भी मुख्यधारा से नही जुड पाये हैं ये आज भी आदिम हालत में रहते हैं और इनका मुख्य काम शिकार करके खाना ही है बिना कपडो के रहने वाले इन जरावा आदिवासियो को देखने का आर्कषण पर्यटको में बहुत होता है  

तो हम सुबह जब बस स्टैंड पर पहुंचे तो हमें पहले पैसे निकालने थे एटीएम से सामने ही गांधी की तस्वीर के पीछे स्टेट बैंक की इमारत है जिसमें एक नही पूरे पांच एटीएम लगे हैं पर उनमें से एक ही चालू था हमने पैसे इसलिये निकाल लिये थे कि कहीं डिगलीपुर या रंगत जैसी जगहो पर एटीएम कम मिलें या फिर चालू ना मिल पायें तो पैसे की परेशानी ना हो इसलिये साथ में उचित मात्रा में नकदी होनी जरूरी है  

एटीएम से पैसे निकालने के बाद हमने सबसे पहले नारियल पानी पिया साथ में मलाई भी खाई तो नाश्ता भी हो गया मैने आपको बताया ही था कि हमें आखिरी बचे तीन टिकट ही मिले थे इसलिये हमारी सीटे बिलकुल पिछली साइड में थी हम जिस रोड पर चलने वाले थे वो अंडमान ट्रंक रोड और नेशनल हाइवे 4 है पर इसकी चौडाई केवल एक बस के चलने लायक है और सडक भी मशीन द्धारा बनी हुई नही है वो तो शुक्र है कि ट्रैफिक ना के बराबर है इसलिये बस अपनी पूरी गति से फर्राटा भरती है

एक आराम और मिल गया पिछली सीट की एक सवारी नही आयी थी इसलिये हम आराम से बैठ सकते थे बस में संदीप भाई की दोस्ती एक लोकल से हो गयी और हम सबको काफी बाते जानने को मिली वैसे मै आपको बता दूं कि यहां का हर आदमी आपको बताने को तैयार है आप एक बात पूछो तो दस जबाब भी सकते हैं कितने हैल्प फुल लोग हैं यहां के  

2 घंटे में पुलिस चौकी गयी अभी कानवाई चलने में समय था रोडवेज बस में जाने की वजह से हमें एक फायदा और हुआ कि हमें कहीं भी कोई रजिस्ट्रेशन कराने की जरूरत नही थी क्योंकि हमने पहले ही अपनी आई डी टिकट कराते समय दे दी थी कानवाई में हमारी बस सबसे बाद में आकर भी सबसे आगे खडी हो गयी ये भी गरीब लोगो को फायदा हुआ समय बिताने के लिये हम सब बस से उतरे तो आसपास निगाह मारी पास में ही एक मंदिर था और चाय पकौडी के साथ बडा और समोसे आदि की दुकाने थी मैने जैसे ही एक ठेली पर पकौडे को देखना चाहा तो दुकानदार जो कि काफी बिजी था ने जोर से कहाले लो जी जो जी चाहे उठाओ खाओ आपकी ही दुकान हैमै समझ नही पा रहा था कि ये ही दुकानदार हमारे यहां पर होता तो लड मरता कि आपने हाथ लगाया ही क्यों ? सौ रूपये लगे जिसमें मैने और जाट देवता ने पकौडे और सांभर बडा और राजेश जी ने पूरी खाई साथ ही पानी की दो लीटर की बोतल भी ली


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कुछ साल पहले तक यहां पर जरावा आदिवासियो का आतंक भी बहुत था अंडमान ट्रंक रोड जिस पर को हम होकर जा रहे थे इस पर जा रहे वाहनो में से खादय पदार्थो आदि को ये लूट लेते थे और अक्सर अपने जहर बुझे तीरो से पर्यटको और आम नागरिको को भी घायल कर देते थे इसलिये यहां पर एक व्यवस्था लागू की गयी और वाहनो को काफिले में गुजारा जाने लगा उस काफिले जिसे कानवाई भी कहते हैं के गुजरने के आठ समय बना दिये गये जब ये काफिला चलता है तो उसके आगे पुलिस वाला और उसके बाद बडी बसे , उसके बाद छोटी कारे फिर से पुलिस रहती है  

पर्यटक अक्सर बहुत गलतियां करते हैं हालांकि आजकल जरावा आदिवासियो का आतंक इतना नही है पर फिर भी कुछ साल पहले एक विदेशी ने लोकल आदमी की मदद से और उसे लालच देकर उनके जंगल में जाकर उनसे मिलने में सफलता हासिल कर ली केवल यहीं तक सीमित रहता तो ठीक था पर उसने जरावाओ की लडकियो की नंगे रूप में नाचते हुए वीडियो बनाई और फिर अपने देश जाकर उसे इंटरनेट पर अपलोड कर दिया इस वीडियो का जब हल्ला मचा तो सरकार हरकत में आयी चिडियाघर के जानवरो की तरह अपने इन आदिवासियो की मजबूरी को यूं उछाले जाते देखकर इनका संरक्षण कर रही सरकार ने इनसे मिलने पर तो पाबंदी लगायी ही साथ ही इनके क्षेत्र से गुजरने वाले काफिले की संख्या घटाकर भी चार कर दी  

मै जरावा के बारे में आपको और जानकारी दूंगा पर अभी तो मै अपना यात्रा वृतांत बता रहा हूं इसलिये आपको महत्वपूर्ण बाते बता दी हैं तो फिलहाल में दिन में चार बार इस चेक पोस्ट से और चार बार ही बारातांग वाले चेक पोस्ट से चार काफिले छूटते हैं इसके अलावा केवल सरकारी प्रशासनिक गाडिया या इमरजैंसी वाले वाहनो को ही इजाजत मिलती है इसलिये इस रास्ते पर सफर करने के लिये समय का बहुत ध्यान रखना होता है जैसे कि पहला काफिला सुबह 9 बजे चलता है तो आपको हर हालत में आठ या साढे आठ तक पहुंच जाना होता है और यहां की चैक पोस्ट पर अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होता है  

जो लेाग पैकेज टूर लेकर जाते हैं या फिर टैेक्सी किराये पर करके बारातांग जाते हैं उन्हे एक फार्म में अपना सारा डाटा भरकर देना होता है इसमें अपने और अपने साथी या ग्रुप के सदस्यो के अलावा अपना फोन 0 , पता और एड्रेस प्रूफ देना होता है आपके चालक या टूर आपरेटर को भी अपना ब्यौरा देना होता है साथ ही सारी जिम्मेदारी उसी की होती है कि आप कोई गलती नही करेंगें करेंगे तो आपके साथ साथ आपरेटर की भी गलती मानी जायेगी

ठीक समय पर हमारा काफिला, जिसमें हमारी बस पुलिस वाले की मोटरसाईकिल के बिलकुल पीछे चल रही थी , रवाना हुआ बस या कार में किसी को भी फोटो खींचने की मनाही है कैमरे से फोटो खींचा तो हर आदमी जो आपके पास में बैठा है उसकी जिम्मेदारी है कि वो इसकी सूचना पुलिस को दे दे इसलिये आप ऐसा कर ही नही सकते कोई भी गाडी किसी दूसरी गाडी को ओवरटेक नही कर सकती 40 से ज्यादा की स्पीड नही चला सकते जरावा लोग यदि रास्ते में मिल जायें तो उन्हे कुछ भी खाने पीने का सामान देना या पैसे आदि देना दंडनीय अपराध है  

पूरे दो घंटे आंख चिपकाये बैठे रहे और एक बार बस दस सैकेंड के लिये चार जरावा आदिवासी दिखे वे सडक पर सरकारी गाडी से कुछ सामान ले रहे थे वे पूर्णत नंगे नही थे उन्होने नेकर पहने थे मेरे पूछने पर सहयात्री ने बताया कि हां अब कुछ जरावा नेकर पहन लेते हैं


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जरावा आदिवासी केवल मुझे दिखे थे जाट देवता या राजेश जी को नही क्योंकि मै विंडो सीट पर ना होकर सबसे पिछली सीट पर था और मैने मुडकर पीछे से भी देखा था खैर दो घंटे सफर के बाद हम मिडिल स्ट्रेट नाम की जगह पर पहुंचे

मै आपको बताना चाहता हूं कि पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर जाने के लिये जो अंडमान ट्रंक रोड है जो कि नेशनल हाइवे 4 भी है ये पूरी तरह से रोड नही है इस रोड पर रंगत से पोर्ट ब्लेयर के बीच में दो जगह समुद्र की धारा आती है

जब भी आप गूगल मैप में अंडमान को देखेंगें तो ये एक लम्बा सा द्धीप आपको दिखायी देगा अंडमान का ये भाग सबसे बडी जमीन वाला है जिसकी एक छोर से दूसरे छोर तक की लम्बाई 300 से 400 किलोमीटर के करीब होगी अनुमानित मै इसलिये बता रहा हूं कि ये लम्बाई सीधी नही है पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर तक अंडमान ट्रंक रोड की लम्बाई करीब 325 किलोमीटर है पर पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर बिलकुल सीध में नही है  

बीच में जो दो जगह धारा आती है उसमें भी मै कन्फयूज था जब मै नेट पर सर्च करता था तो इस रोड पर कई नाम पाते थे किसी ने मिडिल स्ट्रेट जेटटी पार करना लिखा तो किसी ने बारातांग जेटटी दूसरी वाली में किसी ने उतरा जेटटी लिखा तो एक नाम और था मै इन्हे चार समझ रहा था पर नक्शे के हिसाब से दो धारा ही थी असल में मसला ये था कि सडक के जिस छोर पर हमारी बस आकर खडी हुई और सडक समाप्त हो गयी पोर्ट ब्लेयर की तरफ वाली इस जेटटी को मिडिल स्ट्रेट कहा जाता है जब हम इस धारा को पार करके दूसरे किनारे पर उतरेंगें तो हम जिस स्टेशन या जगह पर या जेटटी पर उतरेंगे जो कि मिडिल स्ट्रेट के दूसरी तरफ वाला छोर है उसे बारातांग जेटटी कहा जाता है  

हो सकता है आप सोचें कि ये सामान्य बात है हां ये सामान्य बात है पर जब उत्तर भारत में रहने वाला और कभी कभार पर्यटन करने वाला व्यक्ति ऐसी जगह पर जाता है जहां पर आवागमन का साधन अधिकतर नाव या पानी के जहाज हैं तो उसे वहां पर धक्के खाने के बाद ये सामान्य ज्ञान समझ में आता है कई जगह पर फेरी के नाम से पुकारी जाने वाली पानी के जहाजो को यहां पर बोट या शिप कहते हैं तो वे जिस जगह से यात्रियो को उतारती या चढाती हैं उन्हे जेटटी कहा जाता है यानि बस स्टैंड की तरह ये इसका नाम है पोर्ट ब्लेयर में बहुत सारी जेटटी हैं और अलग अलग द्धीप पर जाने के लिये उनका इस्तेमाल किया जाता है  

तो हम मिडिल स्ट्रेट पर गये थेे हमारी बस की यात्रा ने हमें हर जगह फायदा पहुंचाया यहां भी सरकारी बस बाद में आने के बावजूद पहले से खडी सब गाडियो से आगे आकर सीना तानकर सबसे पहले जाने के लिये खडी हो गयी बेचारे प्राइवेट कार या टैक्सी वालो को तब इजाजत मिलेगी जब पहले बसे चढ जायेंगी अंडमान में आने के बाद समंदर की यात्रा का ये पहला अवसर था दूरी ज्यादा नही थी लेकिन रोमांच ज्यादा था मै गंगासागर और द्धारका में इस तरह थोडी दूरी की समुद्री यात्राऐं कर चुका हूं पर गंगासागर में इसी तरह की सरकारी फेरी में ना जाकर हम नाव में गयेे जिसका हमें नुकसान भी हुआ ये छोटे शिप सुरक्षित होते हैं और सुगम भी  

हमारा शिप एम वी पिलोपंज हमारी ओर रहा था तब तक हमने मैनग्रोव के जंगल और समुद्र के सौंदर्य को बढाते नीले आसमान का मजा उठाया इस बीच शिप आकर किनारे पर लग गया और उसने अपनी बांहो को फैला दिया उसके आमंत्रण को हम अस्वीकार नही कर सके


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कल मैने आपको बताया था कि बडे शिप या सरकारी फेरी कहे जाने वाले पानी के जहाज सुरक्षित और सुगम होते हैं और मेरी गुजारिश है कि आप कभी भी नाव में समंदर में यात्रा करने के मौके को टालने की कोशिश करें  

हमारे साथ गंगासागर में ऐसा ही हुआ था जिस जगह का किराया दस रूपये था वहां का किराया 50 रूपये लिया गया और दस लोगो की जान चली गयी सरकारी रेलवे के विभाग आई आर सी टी सी के टूर मैनेजर ने थोडे से पैसो और कमीशन के चक्कर में सरकारी फेरी की बजाय नाव बुक कर ली हर यात्री से 50 रूपये लिये गये और एक नाव जिसकी लाइसेंस नही था और उसकी उम्र पूरी हो चुकी थी , यही नही उसकी यात्री क्षमत 40 की थी उनमें सौ सौ यात्रियो को बिठा दिया गया

जब जहाज किनारे पर आया तो बिना कुछ बताये सबने एक तरफ को उतरना शुरू कर दिया और नाव एक तरफ को झुकती चली गयी। पचास के करीब आदमी समुद्र में गिर गये और हमने मौत का तांडव अपनी आंखो से देखा दस की तुरंत मौत हो गयी जिनको बचाया गया उनको वहां पर खडे लोगो और सहयात्रियो ने बचाया नाव वाले तो तुरंत तैरकर भाग गये ये सब इसलिये हुआ और मैने आपको दोबारा बताया कि उन नावो के मुकाबले ये जहाज अपनी संख्या और क्षमता से ही चलते हैं

जहाज के रूकते ही पहले पैदल लोग सवार हो गये बस या कारो में केवल ड्राइवर रह सकते हैं यात्री उपर चढकर केबिन में चले जाते हैं कुछ लोग नीचे भी खडे रह सकते हैं हम भी केबिन में गये पहली बार क्योकि इसके बाद हम केबिन में नही बैठै बल्कि हमेशा समुद्र का आनंद लेने के लिये डेक पर ही रहे यात्रियो के बाद हमारी और एक अन्य बस चढी और उसके बाद चार पांच कारे बाकी लोग दूसरे जहाज का इंतजार करने लगे और हमारा जहाज हमें लेकर चल पडा इस यात्रा का किराया 6 रूपये था बस का किराया क्या था वो पता नही पर प्रति यात्री को बस के किराये से अलग ये किराया देना था

समुद्र के इस करीब पन्द्रह मिनट के सफर में काफी आनंद आया अच्छे नजारे देखने को मिल रहे थे बारातांग जेटटी की तरफ से स्पीड बोट देखने को मिल रही थी जेटटी आयी तो पैदल यात्री उतरे और फिर हमारी बसे हमने रंगत की बस पकडी थी और टिकट भी वहीं तक का था पर हमने इस बस को यहीं पर अलविदा कह दिया और उतर गये


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